माननीय, श्री प्रकाश जावड़ेकर मानव संसाधन विकास मंत्री के हिंदी दिवस पर दिये संदेश
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२०१७ २०१६ २०१५

राजभाषा कार्यान्वयन समिति

संस्थान में राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार तथा राजभाषा अधिनियम 1963 के अन्तर्गत जारी राजभाषा नियम 1976 के उपबन्धों का अनुपालन एवं राजभाषा विभाग द्वारा समय-समय पर हिन्दी के सन्दर्भ में आदेशित नियमों का कार्यान्वयन संस्थान में सुनिश्चित कराने हेतु राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की गई है। उक्त समिति के सदस्य निम्नलिखित हैं :-

अध्यक्ष
प्रो. डॉ. एन. श्रीधरन
निदेशक

सदस्यगण
श्री राजेश मोज़ा
कुलसचिव

डॉ. बिनायक चौधुरी
प्राध्यापक (योजना विभाग)

डॉ. क्षमा पुणताम्बेकर
सहायक प्राध्यापक (योजना विभाग)

श्री गौरव सिंह
सहायक प्राध्यापक (वास्तुकला विभाग)

श्री सन्मार्ग मित्रा
सहायक प्राध्यापक (वास्तुकला विभाग)

श्री शाजू वर्गीज़
उपकुलसचिव (वित्त एवं लेखा)

श्री राजेन्द्र कुमार जेना
सहायक पुस्तकाध्यक्ष

श्री मनीष विनायक झोकरकर
सहायक कुलसचिव

श्री अमित खरे
सहायक कुलसचिव

श्रीमती दीपाली बागची
सहायक कुलसचिव

श्री आनंद किशोर सिंह
अनुभाग अधिकारी (हिन्दी अधिकारी‌- प्रभारी)

श्री सुनील कुमार जायसवाल
हिन्दी सहायक

सुश्री जयति दुदानी
छात्रा (बी. आर्क. द्वितीय वर्ष)
आनंद किशोर सिंह, हिन्दी अधिकारी (अतिरिक्त प्रभार)
सुनील कुमार जायसवाल, हिन्दी सहायक
फोन नं. 0755-2526800










बादल और जमीन

तरस गयी हूँ मैं, क्यों नहीं आते तुम ?

सुख रहा है दामन मेरा, क्यूँ तरसाते तुम ?

पिछली बार भी वक़्त लिया और कर गए एक वादा |

भूल न मेरे शब्द अगली बार आऊंगा जल्दी मन मैं है इरादा |

क्या दिखाऊँ चेहरा अपना अपने इन बच्चो को |

मेरी गोद में पलते है ये लेकिन निर्भरता हो तुम |

तरस गयी हूँ मैं, क्यों नहीं आते तुम ?

 

तुम कहो तो, मैं जल्दी आ जाऊंगा |

अगर कहोगी तो तेरे पर एक बार में बरस जाऊंगा |

लेकिन तुम मेरी, स्थिति नहीं समझ पा रही |

दुनिया बाकी मुझे इतना बता रही |

सूरज चाचा, हो रहे हैं गरम |

टूट रहा हूँ मैं क्यूंकि, मैं हूँ नरम |

सुनने मैं तो आया की, तेरे लाडलो की है करतूत |

जो थे सपूत, वही निकले कपूत |

जिन के लिए तू मांग रही है, इतनी भीख |

तेरी सुन्दरता को मिटाने वाले, नहीं रहे कुछ सीख |

लालच इनका तेरा अस्तित्व मिटा रहा है |

तू बैठी बस इनकी भूख मिटा रही  है |

छोर दे इनका साथ नहीं तो, बना देंगे तुझे बंजर |

तेरी ही सीने में भोक रहे हैं, खंजर |

कुछ दिन बाद जब, मैं जाऊँगा बरस |

इनके मन में भर जाएगा, उल्लास और हरस |

फिर चलाते हैं, तेरे ऊपर औजार |

कहते तुझको माँ, लेकिन नहीं करते प्यार |

तेरे ही गोद से निकले तुझमे ही होंगे ख़त्म |

फिर भी इनका मन न माने रहते बिलकुल बेशरम |

क्यूँ करती है इतना ? जब न सोचे तेरे बारे में |

लड़ते भी खुद में,सिर्फ तुझे मिटाने के लिए |

तुझे देखकर मुझे है, तरस आता |

क्यूँ प्रकर्ति ने ये कार्य बनाया,जब इन्हें कुछ न भाता|

इनका लालच ऐसा, जो की करता हमें बर्बाद |

तू नीचे रो रही मुझे भी लगा प्रदुषण का श्राप |

 

क्या कर सकते है हम ? इस स्थिति में |

जब तक कर्म है अपना, निभाएंगे हर पहर में |

तुम आयो या ना आयो इनके पास है उपाय |

कुछ वर्ष बाद शायद तुम्हारी निर्भरता ख़त्म हो जाए

तुम अपना कर्म निभाते रहो, मैं अपना निभाउंगी |

जब अंत आएगा इनका उसके बाद भी रह जाउंगी |

नयी पीढ़ी के लिए फिर जरुरत बन जाउंगी |

तब तुम अपनी निर्भरता इनको अच्छे से बताना |

हो पिता समान इसका ज्ञान जरुर दिलाना |

आएगा वो समय जब पानी होगा सिर के पार |

उसके बाद खुलेंगे जीवन के नए द्वार |

नयी उमंग एवं तरंग से होगा तेरा सत्कार |

लेकिन तब तक तुम बस करो इंतज़ार |

-          कँवर, अभिषेक,  छात्र